Sunday, August 28, 2011

सपना


रोज  की तरह आज फिर फूलो के बगीचे से गुजरे, तो उन सुर्ख गुलाबो देख एक ख्याल जगा . आँखों में एक चमक उभरी --अरे ये ये फुल कितने ताजगी भरे कितने शोख है और फुल से उसका नक्श उभरने लगा  . हर फुल से धीमा धीमा संगीत गुन्झ रहा था . और अनायास ही हम मुस्कुराने लगे . एक आवाज आई .तोड़ लो न फुल उसके लिए . इस ख्याल से पहले तो हम मुस्काए, फिर शर्माए और फिर घबराये ..के किसी ने देख लिया तो..और लीजिये फुल तोड़ने से पहले ही खयालो में गम हो गए ......और लगे एक सपना देखने ...खुली आँखों से सपना . सपना उस दिन का जब वो हमें फुल देंगे ......उह्ह्ह्हह्ह...कांटा सपना फिर टुटा  .....पर क्या कभी ऐसा होगा ...और होगा तो कब होगा ..जब वो हमें फुल दे ......और उनके फुल देने के अहसास से ही हमें गुदगुदा गया था और हम खो गए फिर सपने में .............गर्र्र्रर्र्र दर्र्रर्र्र ....अरे भाई मरने का इरादा है क्या .......मोटर सयिकिल की आवाज ने  हम चौंका दिया ......और हमने देखा की इस सपने को बुनते बुनते हम पार्क से रोड तक आ चुके थे ....
तभी एक कर्मचारी ने दूसरी महिला कर्मचारी  से कहा एंटी इन्होने तो नई नई  पगड़ी पहनी है ..........अप थक जोगी आराम कर लो ......और मुझे हंसी आ गई क्या ये प्यार भी नया पुराना होता है क्या ........प्यार तो प्यार है ..........
उठो उठो आज कॉलेज नहीं जाना है क्या .................लो  सपना फिर टूट गया था प्यार का ........पर ये सपना भी कितना सुहाना था  झुटा ही सही  टुटा ही सही ...............अहसास तो करा दिया .............

Tuesday, August 23, 2011

कैसे हो गए हम


 हर चीज धुंधली सी है इन दिनों 
अजनबी हवा चली  है इन दिनों 
भूल जाऊ  रहे न  याद कुछ भी 
यारो कुछ दुआ करो इन दिनों
 
चेहरे ही चेहरे कौन है ये लोग 
 पहचाने  नहीं जाते  इन दिनों
 छू कर देखा बदन तो थे 
     मशीन से  इन्सां है इन दिनों 
 
   
        सुना था के नश्वर है वो  
        फिर  कहाँ है वो  इन दिनों 
        डर गई है नए आलम  से या फिर 
            आत्मा भी मरने लगी है इन दिनों  
 

muktak


ये कोरा पन्ना न जाने कितनी बार पढ़ते है
देखने वाले पागल समझते है
वो क्या जाने इसकी गहराई का आलम
हर बार नए राज,नए अल्फाज उभरते है

Saturday, August 6, 2011

muktak


हर चीज धुंधली सी है इन दिनों
अजनबी हवा चली  है इन दिनों
भूल जाऊ  रहे न  याद कुछ भी
यारो कुछ दुआ करो इन दिनों

Monday, April 18, 2011

एक गीत


गुच्छे घटाओं के छाने लगे
के बीते दिन याद आने लगे  
       मेले अकेले  लगाने लगे 
       के सोये अरमान जगाने लगे 
    

कही कुछ अनकही सी कहानी 
तस्वुर वही फिर से  आने लगे 
सुलगते सिसकते वो दागे-ए- मुहोबत 
के रिसने लगे करहाने लगे 

पपीहे वीणा बजाने लगे
        पते भी ताने सुनाने लगे 
        नाचन लगे मोर सुर ताल में  
        के भवरे नगाड़े बजाने लगे 
 
  तन्हाईया रास  आने लगी 
        अंगड़ाईया गुनगुनाने लगी 
 लड़कपन हमारा जफ़ाए तुम्हारी 
लबो पे वही गीत लाने लगी  

बहकते बदन की  महकती खुशबु 
आँचल हमारा उड़ाने लगे 
जुगनू नहाये हुए चांदनी में
दर्पण पुराने दिखाने लगे 

मनाते है खुद रूठ जाते है यु ही 
मचलते है खुद को सताने लगे 
भरी दोपहरी, रातो में युही 
 कोठे के  चकर लगाने लगे 

muktak

तुम हवा के झोके से  रुख  बदल लेते 
मैं नदी सी रास्ते बदलती नहीं खुद बनाती हूँ 
तुम बादल से चंचल उड़ते डोलते बरसते 
मैं धरा सी अडिग अचल गहन धर्य  विश्वास दिलाती हूँ 

Monday, April 4, 2011

एक गीत

'आत्मा की पुकार'       

खुद से बाते करती हूँ 
गिरती और सभलती हूँ 

खामोश शाम
 बोझिल सवेरा 
बुझते दिए का
 ढलता सुनहरा
परछाई सी सिसकती हूँ 

खुद से बाते करती हूँ 
गिरती और सभलती हूँ 

आते जाते 
दीवारों पे
रस्ते-रस्ते 
गलियारों में 
उसका नाम खुरचती हूँ 

खुद से बाते करती हूँ 
गिरती और सभलती हूँ 

कान्हा तो संग 
खेरू होरी 
नेह तेरे सो 
देह भिगो ली 
मन का मनका जप्ती हूँ 

खुद से बाते करती हूँ 
गिरती और सभलती हूँ